पूर्णिया के कलाभवन विवाह परिसर में 1 दिसंबर, सोमवार की रात इंसानियत की एक ऐसी मिसाल देखने को मिली, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। सनातन सेवक संघ द्वारा आयोजित सामूहिक विवाह में कुल 10 जोड़ों का पवित्र वैदिक रीतियों से विवाह संपन्न हो रहा था। हर जोड़ा अपने–अपने माता-पिता और परिजनों के साथ पहुंचा था। लेकिन इन्हीं जोड़ों के बीच एक ऐसा जोड़ा भी था, जिसके पास न वर-पक्ष से कोई था और न वधू संजनी कुमारी के माता-पिता ही उपस्थित थे।
कन्यादान के समय चला पता, वह अनाथ है
रश्मों के दौरान जब कन्यादान का समय आया, तब सबको पता चला कि संजनी इस दुनिया में बिल्कुल अकेली है। इस बात ने वहां मौजूद सभी लोगों को भावुक कर दिया। तभी आगे बढ़कर डॉक्टर अनिल कुमार गुप्ता और उनकी पत्नी पिंकी गुप्ता ने संजनी के माता-पिता बनने का निर्णय लिया। उन्होंने न केवल उसका हाथ वर को सौंपा, बल्कि उसे अपनी बेटी मानकर समाज को यह सशक्त संदेश भी दिया कि “बेटी किसी एक की नहीं होती, पूरे समाज की होती है।
डॉक्टर गुप्ता और उनकी पत्नी बने माता-पिता
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जब डॉक्टर गुप्ता और उनकी पत्नी पिंकी गुप्ता ने शंख बजाकर संजनी का हाथ वर के हाथ में दिया, तो दोनों की आंखें भर आईं। बेटी का दान करते समय पिंकी गुप्ता की आंखों से बहते आंसू केवल भावनाओं के नहीं थे, बल्कि सामाजिक समरसता और मानवीयता की एक गहरी सीख भी दे रहे थे। पिंकी गुप्ता ने कहा कि उन्हें ईश्वर ने कन्यादान का जो अवसर दिया, वह उनके लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं है। उन्होंने कहा कि बेटी का घर बसना माता-पिता के लिए सबसे बड़ा सुख है, और आज ईश्वर ने हमें वह सुख दिया। वहीं डॉक्टर गुप्ता ने भी स्वीकार किया कि संजनी का कन्यादान करते हुए वे बेहद भावुक हो उठे।
समाज को जोड़ने वाला प्रेरक संदश
यह घटना केवल एक विवाह नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला एक प्रेरक संदेश है। यह बताती है कि अनाथ होना किसी की तकदीर हो सकती है, लेकिन उसे परिवार देना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। यही है सच्ची इंसानियत, यही है सच्चा धर्म।
















