बिहार विधानसभा चुनाव में मिली करारी पराजय के बाद कांग्रेस ने दिल्ली स्थित इंदिरा भवन में गुरुवार को समीक्षा बैठक तो बुलाई थी। लेकिन पार्टी को मिली हार से ज्यादा उसकी आंतरिक अस्थिरता और नेतृत्वहीनता इस बैठक में खुलकर सामने आई। बैठक हार के कारणों पर चर्चा की बजाय व्यक्तिगत टकराव, झगड़े और धमकियों का अखाड़ा बन गई। हार का कारण खोजने आई कांग्रेस, खुद का ‘टूटन’ उजागर कर बैठी।
वैशाली के कांग्रेस प्रत्शशी ने पूर्णिया के पूर्व प्रत्याशी को दी जान से मारने की धमकी
बैठक के अंदर से मिली जानकारी के अनुसार, चर्चा का माहौल शुरू से ही तनावपूर्ण था। कई नेता गुटबाजी, संसाधनों के बंटवारे और टिकट चयन में हुई अनियमितताओं को लेकर पहले से नाराज़ थे। इसी बीच अचानक, पूर्णिया के प्रत्याशी जितेंद्र यादव और वैशाली के प्रत्याशी इंजीनियर संजीव के बीच इतना तेज विवाद हुआ जिसने सबको चौंका दिया।
लेकिन इस विवाद की जड़ सिर्फ चुनावी हार नहीं
मुद्दा था कांग्रेस की बिहार इकाई में लगातार बढ़ती फूट और नेतृत्व का कमजोर नियंत्रण।
“गोली मारने की धमकी” महज़ आरोप नहीं, आंतरिक अराजकता का प्रतीक?
जितेंद्र यादव ने सबसे बड़े मंच पर आरोप लगाया कि इंजीनियर संजीव ने उन्हें गोली मारने की धमकी दी।
यह आरोप जितना चौंकाने वाला है, उतना ही कांग्रेस के भीतर पनप रही अव्यवस्था की ओर इशारा करता है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह पहला मौका नहीं है जब बिहार कांग्रेस में ऐसी सुनाई दी रही आंतरिक टकराहट सार्वजनिक हुई है।
लेकिन धमकी का आरोप पार्टी के लिए एक गंभीर कानूनी और संगठनात्मक चुनौती बन गया है।
क्यों भड़कता जा रहा है कांग्रेस का अंदरूनी गुस्सा?
सियासी जानकार इसे कुछ बड़े कारणों से जोड़कर देख रहे हैं:
• केंद्र और राज्य नेतृत्व के बीच तालमेल का अभाव
• टिकट वितरण में असंतोष
• चुनाव प्रचार में संसाधनों की कमी
• हार के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराने की प्रवृत्ति
• हाईकमान का कमजोर नियंत्रण
यह विवाद एक संकेत है कि बिहार कांग्रेस सिर्फ चुनाव हारकर नहीं आई है—
वह संगठनात्मक रूप से भी बंट चुकी है।
प्रभारी को दी गई जानकारी, लेकिन कार्रवाई का इंतजार
जितेंद्र यादव ने आरोपों की विधिवत जानकारी अपने प्रभारी को दे दी है, लेकिन अभी तक पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
यह चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है—
क्या कांग्रेस इस विवाद को दबाने की कोशिश कर रही है?
या फिर पार्टी मान चुकी है कि यह मामला आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है?
निष्कर्ष: बिहार कांग्रेस अब हार नहीं, अपनी ही अंदरूनी लड़ाई का सामना कर रही है
दिल्ली की समीक्षा बैठक ने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस की हार सिर्फ जनता के वोट में नहीं दिखती—
उसकी सबसे बड़ी हार उसके अपने नेताओं के बीच घटती विश्वास और बढ़ते अविश्वास में है।
बिहार कांग्रेस अब एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहाँ उसे यह तय करना है कि वह
“मूल समस्या पर काम करेगी या एक-दूसरे को ही दुश्मन मानकर लड़ती रहेगी।”
















